श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  3.19.99 
एइ - मत गौरहरि, गन्धे कैल मन चुरि,
भृङ्ग - प्राय इति - उति धाय ।
याय वृक्ष - लता - पाशे, कृष्ण स्फुरे सेइ आशे,
कृष्ण ना पाय, गन्ध - मात्र पाय ॥99॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु का मन कृष्ण के शरीर की सुगंध से मोहित होकर भौंरे की तरह इधर-उधर भागा। वे पेड़-पौधों की ओर दौड़े, इस आशा में कि भगवान कृष्ण प्रकट होंगे, परन्तु उन्हें केवल वही सुगंध मिली।
 
Thus, the fragrance of Krishna's body captivated Sri Chaitanya Mahaprabhu's mind, causing him to run around like a bumblebee. He would run to trees and creepers in the hope that Lord Krishna would appear, but all he could get was the fragrance of Krishna's body.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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