श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  3.19.98 
मदन - मोहन - नाट, पसारि गन्धेर हाट
जगन्नारी - ग्राहके लोभाय ।
विना - मूल्ये देय गन्ध, गन्ध दिया करे अन्ध
घर याइते पथ नाहि पा य” ॥98॥
 
 
अनुवाद
नाट्य अभिनेता मदनमोहन ने सुगंधों की एक ऐसी दुकान खोली है जो दुनिया भर की महिलाओं को अपनी ग्राहक बनने के लिए आकर्षित करती है। वह सुगंधें मुफ़्त में बाँटता है, लेकिन वे महिलाओं को इतना अंधा बना देती हैं कि उन्हें घर लौटने का रास्ता ही नहीं सूझता।
 
"Actor Madan Mohan has opened a perfume shop, and this fragrance attracts women from all over the world as customers. He distributes this fragrance for free, but it blinds all the women so much that they can't even find their way home."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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