श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  3.19.81 
पुष्प - गन्ध लञा वहे मलय - पवन ।
‘गुरु’ हञा तरु - लताय शिखाय नाचन ॥81॥
 
 
अनुवाद
एक हल्की हवा बह रही थी, जिसमें सुगंधित फूलों की खुशबू थी। हवा एक गुरु बन गई थी और सभी पेड़ों और लताओं को नृत्य करना सिखा रही थी।
 
A gentle breeze was blowing, carrying the scent of fragrant flowers. It acted as a teacher, teaching all the trees and creepers to dance.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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