श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  3.19.75 
एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथ - दास ।
गौराङ्ग - स्तव - कल्पवृक्षे करियाछे प्रकाश ॥75॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की इस लीला का वर्णन रघुनाथदास गोस्वामी ने अपने गौरांगस्तवकल्पवृक्ष नामक ग्रन्थ में बहुत सुन्दरता से किया है।
 
Raghunath Das Goswami has beautifully described this pastime of Sri Chaitanya Mahaprabhu in his book Gauranga Stava Kalpavriksha.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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