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श्लोक 3.19.74  |
ताँर भये नारेन प्रभु बाहिरे याइते ।
ताँर भये नारेन भित्त्ये मुखाब्ज घषिते ॥74॥ |
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| अनुवाद |
| शंकर के भय से श्री चैतन्य महाप्रभु न तो अपना कक्ष छोड़ सकते थे और न ही अपना कमल जैसा मुख दीवारों पर रगड़ सकते थे। |
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| Due to fear of Shankara, Sri Chaitanya Mahaprabhu neither left his room nor rubbed his lotus-like face on the walls. |
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