| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार » श्लोक 63 |
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| | | | श्लोक 3.19.63  | प्रभु कहेन, - “उद्वेगे घरे ना पारि रहिते ।
द्वार चाहि’ बुलि’ शीघ्र बाहिर ह - इते ॥63॥ | | | | | | | अनुवाद | | श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, "मैं इतनी चिंता में था कि कमरे में नहीं रह सकता था। मैं बाहर जाना चाहता था, इसलिए मैं दरवाज़ा ढूँढ़ते हुए कमरे में इधर-उधर भटकता रहा।" | | | | Sri Chaitanya Mahaprabhu replied, "I was in such a state of agitation that I could not stay in the room. I wanted to go out, so I started walking around the room looking for the door. | | ✨ ai-generated | | |
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