श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.19.57 
प्रेमावेशे महाप्रभुर गर - गर मन ।
नाम - सङ्कीर्तन करि’ करेन जागरण ॥57॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु सारी रात जागते रहे और हरे कृष्ण महामंत्र का जप करते रहे, उनका मन आध्यात्मिक आनंद से अभिभूत था।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu's mind was overwhelmed with spiritual joy, so he remained awake the whole night chanting the Hare Krishna mantra.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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