श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.19.53 
एइ - मत गौर - राय, विषादे करे हाय हाय ,
‘हा हा कृष्ण, तुमि गेला कति?’।
गोपी - भाव हृदये, तार वाक्ये विलापये ,
‘गोविन्द दामोदर माधवेति’ ॥53॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु विरह की भावना में विलाप करते हुए बोले, "हाय, हाय! हे कृष्ण, आप कहाँ चले गए?" गोपियों के भावों को हृदय में अनुभव करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु उनके शब्दों में व्यथित होकर बोले, "हे गोविंद! हे दामोदर! हे माधव!"
 
In this way, Sri Chaitanya Mahaprabhu would lament in separation, "Alas, alas! O Krishna, where have you gone?" Sri Chaitanya Mahaprabhu, feeling the feelings of the gopis in his heart, would express his anguish through their words, "O Govinda! O Damodar! O Madhava!"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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