श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.19.52 
कृष्णे केने करि रोष, आपन दुर्दैव - दोष
पाकिल मोर एइ पाप - फल ।
ये कृष्ण - मोर प्रेमाधीन, तारे कैल उदासीन
एइ मोर अभाग्य प्रबल” ॥52॥
 
 
अनुवाद
"फिर भी मैं कृष्ण पर क्रोधित क्यों होऊँ? यह मेरे अपने दुर्भाग्य का दोष है। मेरे पाप कर्मों का फल पक गया है, और इसलिए कृष्ण, जो सदैव मेरे प्रेम पर निर्भर रहे हैं, अब उदासीन हैं। इसका अर्थ है कि मेरा दुर्भाग्य बहुत प्रबल है।"
 
"Still, why should I be angry with Krishna? It's my own misfortune. The fruits of my sinful deeds have ripened, so Krishna, who was always under my love, is now indifferent to me. This means that my misfortune is extremely severe."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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