श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.19.48 
अरे विधि अकरुण, देखाञा कृष्णानन
नेत्र - मन लोभाइला मोर ।
क्षणेके करिते पान, काड़ि’ निला अन्य स्थान
पाप कैलि ‘दत्त - अपहार’ ॥48॥
 
 
अनुवाद
"हे विधाता, आप कितने निर्दयी हैं! आप कृष्ण का सुंदर मुख प्रकट करते हैं और मन व नेत्रों को लोलुप बनाते हैं, किन्तु क्षण भर के लिए उस अमृत का पान करने के बाद, आप कृष्ण को किसी अन्य स्थान पर ले जाते हैं। यह बहुत बड़ा पाप है क्योंकि इस प्रकार आप दान में दिया गया अपना ही सब कुछ छीन लेते हैं।
 
"O Creator, how cruel you are! You reveal Krishna's beautiful face and entice the mind and eyes, but before they can even drink the nectar for a moment, you send Krishna away to another place. This is a grave sin, for in this way you take away what has been donated."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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