श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.19.45 
अहो विधातस्तव न क्वचिद्दया संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः ।
तांश्चाकृतार्थान्वियुनङ्क्ष्यपार्थकं विचेष्टितं तेऽर्भक - चेष्टितं यथा ॥45॥
 
 
अनुवाद
"हे विधाता, तुममें दया नहीं है! तुम देहधारी आत्माओं को मित्रता और स्नेह से जोड़ते हो, किन्तु उनकी इच्छाएँ पूरी होने से पहले ही उन्हें अलग कर देते हो। तुम्हारे कार्य बच्चों की मूर्खतापूर्ण शरारतों जैसे हैं।"
 
"O Creator, you have no mercy at all! You first bring embodied beings together through friendship and affection, but before their desires are fulfilled, you separate them. Your actions are like the foolish games of children."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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