श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.19.41 
जिनिया तमाल - द्युति, इन्द्रनील - सम कान्ति
से कान्तिते जगत्माताय ।
श्रङ्गार - रस - सार छा नि’, ताते चन्द्र - ज्योत्स्ना सा नि’
जानि विधि निरमिला ताय ॥41॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण की शारीरिक कांति इंद्रनील मणि के समान चमकती है और तमाल वृक्ष की कांति से भी बढ़कर है। उनके शरीर की कांति समस्त जगत को उन्मत्त कर देती है क्योंकि ईश्वर ने दाम्पत्य प्रेम के रस को परिष्कृत करके और उसमें चन्द्रमा की चमक मिलाकर उसे पारदर्शी बना दिया है।"
 
"Krishna's physical radiance is as brilliant as the sapphire, surpassing the radiance of the Tamal tree. The radiance of His body drives the entire world mad, for the Creator has refined the essence of the sweet love and mixed it with moonlight, making it transparent."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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