श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.19.40 
एक - बार यार नयने लागे, सदा तार हृदये जागे ,
कृष्ण - तनु - येन आम्र - आठा ।
नारी - मने पैशे हाय, यत्न नाहि बाहिराय ,
तनु नहे, - सेया - कुलेर काँटा ॥40॥
 
 
अनुवाद
"यदि किसी व्यक्ति की दृष्टि एक बार भी कृष्ण के उस सुंदर शरीर पर पड़ जाए, तो वह उसके हृदय में सदैव प्रतिष्ठित रहता है। कृष्ण का शरीर आम के वृक्ष के रस के समान है, क्योंकि जब वह स्त्रियों के मन में प्रवेश करता है, तो लाख प्रयत्न करने पर भी बाहर नहीं निकल पाता। इस प्रकार कृष्ण का असाधारण शरीर सेया बेर के वृक्ष के काँटे के समान है।"
 
"If a person's eyes capture Krishna's beautiful body even once, it remains prominent within their heart forever. Krishna's body is like the sap of the mango tree, for when it enters the hearts of women, it cannot be extracted even with great effort. Similarly, Krishna's unique body is like the thorn of the seya jujube tree.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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