श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.19.39 
काहाँ से चूड़ार ठाम, शिखि - पिञ्छेर उड़ान
नव - मेघे येन इन्द्र - धनु ।
पीताम्बर - तड़ियुति, मुक्ता - माला - बक - पाँति
नवाम्बुद जिनि’ श्याम - तनु ॥39॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, वह सुन्दर मुकुट कहाँ है जिस पर मोर पंख लगा है, मानो नए बादल पर इंद्रधनुष चमक रहा हो? वे पीले वस्त्र कहाँ हैं, जो बिजली की तरह चमक रहे हैं? और वह मोतियों का हार कहाँ है जो आकाश में उड़ते हुए बगुलों के झुंड जैसा दिखता है? कृष्ण का श्यामवर्ण शरीर नए श्यामवर्णी मेघ पर विजय प्राप्त कर रहा है।
 
"O dear friend, where is that beautiful crown, the peacock feather on which looks like a rainbow among the new clouds? Where is that yellow robe, which shines like lightning? And where is that pearl necklace, whose pearls look like a line of herons flying in the sky? Krishna's dark body is capable of defeating the new dark clouds."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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