श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.19.18 
तरजा - प्रहेली आचार्य कहेन ठारे - ठोरे ।
प्रभु मात्र बुझेन, केह बुझिते ना पारे ॥18॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य ने अस्पष्ट भाषा में एक कविता लिखी थी जिसका आशय यह था कि श्री चैतन्य महाप्रभु तो समझ सकते थे, परन्तु अन्य नहीं।
 
Advaita Acharya had written a song in ambiguous language, the meaning of which Sri Chaitanya Mahaprabhu could understand, but others could not.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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