श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  3.19.106 
अलौकिक प्रभुर चेष्टा’, ‘प्रलाप’ शुनिया ।
तकर् ना करिह, शुन विश्वास करिया ॥106॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलाप निस्संदेह असाधारण हैं, विशेषकर उनका उन्मत्त-सा बोलना। अतः जो कोई इन लीलाओं के बारे में सुनता है, उसे सांसारिक तर्क नहीं देने चाहिए। उसे केवल पूर्ण श्रद्धा के साथ लीलाओं का श्रवण करना चाहिए।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu's actions, especially his mad-like speech, are undoubtedly unusual. Therefore, anyone listening to these pastimes should refrain from worldly reasoning. They should simply listen to them with complete devotion.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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