श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 18: महाप्रभु का समुद्र से बचाव  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.18.57 
एका रात्र्ये बुलि’ मत्स्य मारिये निर्जने ।
भूत - प्रेत आमार ना लागे ‘नृसिंह’ - स्मरणे ॥57॥
 
 
अनुवाद
मैं रात में अकेले ही निर्जन स्थानों में मछलियाँ मारता फिरता हूँ, किन्तु चूँकि मैं भगवान नृसिंह का स्तोत्र स्मरण करता हूँ, इसलिए भूत मुझे स्पर्श नहीं करते।
 
“I go fishing in lonely places at night; yet ghosts and spirits cannot touch me, because I remember the praises of Lord Narasimha.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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