श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 18: महाप्रभु का समुद्र से बचाव  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  3.18.39 
प्रभुर विच्छेदे कार देहे नाहि प्राण ।
अनिष्टा - शङ्का विना कार मने नाहि आन ॥39॥
 
 
अनुवाद
प्रभु के वियोग में सभी को ऐसा लग रहा था मानो उनके प्राण ही निकल गए हों। भक्तों ने सोचा कि ज़रूर कोई अनहोनी हुई होगी। उन्हें और कुछ सूझ ही नहीं रहा था।
 
Everyone felt as if their lives were gone at the loss of Mahaprabhu. All the devotees concluded that some tragedy had surely occurred. They could think of nothing else.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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