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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 3: अन्त्य लीला
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अध्याय 18: महाप्रभु का समुद्र से बचाव
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श्लोक 30
श्लोक
3.18.30
तरङ्गे वहिया फिरे, - येन शुष्क काष्ठ ।
के बुझिते पारे एइ चैतन्येर नाट? ॥30॥
अनुवाद
लहरें उन्हें सूखी लकड़ी के टुकड़े की तरह इधर-उधर ले जा रही थीं। श्री चैतन्य महाप्रभु के इस नाटकीय अभिनय को कौन समझ सकता है?
The waves swept him away like a dry log. Who can understand this dramatic performance by Sri Chaitanya Mahaprabhu?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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