श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 18: महाप्रभु का समुद्र से बचाव  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.18.23 
जीव ह ञा करे येइ ताहार वर्णन ।
आपना शोधिते तार छोंये एक ‘कण’ ॥23॥
 
 
अनुवाद
जब कोई साधारण जीव श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का वर्णन करता है, तो वह उस महासागर की एक बूँद को छूकर स्वयं को पवित्र कर लेता है।
 
When an ordinary being narrates the pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu, he himself purifies himself by touching a drop of that ocean.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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