श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  3.17.70 
एइ त’ कहिलुँ ‘कूर्माकृति’ - अनुभाव ।
उन्माद - चेष्टित ताते उन्माद - प्रलाप ॥70॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के कछुए जैसे परमानंदपूर्ण परिवर्तन का वर्णन किया है। उस परमानंद में, वे पागलों की तरह बोलते और व्यवहार करते थे।
 
I have thus described Sri Chaitanya Mahaprabhu's condition of becoming like a tortoise. In that state, he would talk and act like a madman.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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