श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  3.17.59 
“मन मोर वाम - दीन, जल विना येन मीन
कृष्ण विना क्षणे मरि’ याय ।
मधुर - हास्य - वदने, मन - नेत्र - रसायने
कृष्ण - तृष्णा द्विगुण बाड़ाय ॥59॥
 
 
अनुवाद
"यदि मैं कृष्ण का चिंतन न करूँ, तो मेरा दरिद्र मन जल बिन मछली की भाँति क्षण भर में ही मर जाएगा। किन्तु जब मैं कृष्ण का मधुर मुस्कान वाला मुख देखता हूँ, तो मेरा मन और आँखें इतनी प्रसन्न होती हैं कि उनके प्रति मेरी इच्छा दोगुनी हो जाती है।
 
"If I do not think of Krishna, my poor mind will die in a moment, just as a fish dies when it is taken out of water. But when I see Krishna's sweet, smiling face, my mind and my eyes become so happy that my desire to see Him doubles again.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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