Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.17.54 
क्षणे मन स्थिर हय, तबे मने विचारय
बलिते ह - इल भावोद्गम ।
पिङ्गलार वचन - स्मृति, कराइल भाव - मति
ताते करे अर्थ - निर्धारण ॥54॥
 
 
अनुवाद
अचानक, श्री चैतन्य महाप्रभु शांत हो गए और अपनी मनःस्थिति पर विचार करने लगे। उन्हें पिंगला के शब्द याद आ गए, और इससे एक ऐसा आनंद उत्पन्न हुआ कि वे बोलने के लिए प्रेरित हुए। इस प्रकार उन्होंने श्लोक का अर्थ समझाया।
 
Suddenly, Sri Chaitanya Mahaprabhu calmed down and began to reflect on his state of mind. He remembered Pingala's words, and this stirred an emotional emotion within him, prompting him to speak. He then began to explain the meaning of this verse.
तात्पर्य
पिङ्गला एक वेश्या थी जिसने कहा था, "आशा के विरुद्ध आशा करने से केवल दुख ही प्राप्त होता है। निराशा ही सबसे बड़ा सुख है।" श्री चैतन्य महाप्रभु को यह वचन याद था, जिससे वे बहुत प्रसन्न होते थे। पिङ्गला की कथा श्रीमद्भागवत, एकादश स्कन्ध, आठवें अध्याय, श्लोक 22-44 में और साथ ही महाभारत, शान्ति-पर्व, अध्याय 174 में मिलती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)