श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.17.48 
एइ शब्दामृत चारि, यार हय भाग्य भारि
सेइ कर्णे इहा करे पान ।
इहा येइ नाहि शुने, से काण जन्मिल केने
काणाकड़ि - सम सेइ काण” ॥48॥
 
 
अनुवाद
"केवल परम भाग्यशाली ही इन चार अमृतमय ध्वनियों को सुन सकते हैं - कृष्ण के शब्द, उनके घुंघरूओं और चूड़ियों की झंकार, उनकी वाणी और उनकी बांसुरी का कंपन। यदि कोई इन ध्वनियों को नहीं सुनता, तो उसके कान छिद्रयुक्त छोटे शंखों के समान व्यर्थ हैं।"
 
Only one who is extremely fortunate can hear these four nectar-like sounds—Krishna's words, the tinkling of His anklets and bracelets, His voice, and the sound of His flute. If one cannot hear these sounds, his ears are as useless as the holes in a small conch shell."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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