श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.17.45 
से अमृतेर एक - कण, कर्ण - चकोर - जीवन
कर्ण - चकोर जीये सेइ आशे ।
भाग्य - वशे कभु पाय, अभाग्ये कभु ना पाय
ना पाइले मरये पियासे ॥45॥
 
 
अनुवाद
"उस दिव्य, आनंदमय अमृत का एक कण ही ​​कान का जीवन और आत्मा है, जो उस अमृत को चखने की आशा में जीवित रहने वाले चकोरे पक्षी के समान है। कभी-कभी, सौभाग्य से, पक्षी उसका स्वाद ले लेता है, लेकिन कभी-कभी दुर्भाग्य से वह उसे चख नहीं पाता और इसलिए प्यास से लगभग मर जाता है।"
 
"A particle of that divine, blissful nectar is the life of the ear, which, like the Chakor bird, lives in the hope of tasting that nectar. Fortunately, this bird may sometimes taste it, but unfortunately, sometimes it cannot, and so it dies of thirst."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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