श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.17.38 
वेणु - नाद अमृत - घोले, अमृत - समान मिठा बोले ,
अमृत - समान भूषण - शिञ्जित ।
तिन अमृते हरे काण, हरे मन, हरे प्राण ,
केमने नारी धरिबेक चित ?” ॥38॥
 
 
अनुवाद
"आपकी बांसुरी की मधुर ध्वनि, आपके मधुर शब्दों का अमृत और आपके आभूषणों की अमृतमय ध्वनि मिलकर हमारे कानों, मन और प्राणों को आकर्षित करती है। इस प्रकार आप हमें मार रहे हैं।"
 
"The nectar-like buttermilk of your flute's sound, the nectar of your sweet words, and the nectar-like sound of your ornaments—these three combine to captivate our ears, minds, and souls. This is how you are killing us."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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