श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.17.36 
धर्म छाड़ाय वेणु - द्वारे, हाने कटाक्ष - काम - शरे,
लज्जा, भय, सकल छाड़ाय ।
एबे आमाय क रि’ रोष, कहि’ पति - त्यागे ‘दोष’,
धार्मिक ह ञा धर्म शिखाय! ॥36॥
 
 
अनुवाद
"आपकी बांसुरी की ध्वनि, आपकी दृष्टि के साथ, जो हमें काम के बाणों से बलपूर्वक छेदती है, हमें धार्मिक जीवन के नियमों की उपेक्षा करने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार हम काम-वासनाओं से उत्तेजित होकर समस्त लज्जा और भय त्यागकर आपकी शरण में आते हैं। परन्तु अब आप हमसे क्रोधित हैं। आप हमारे द्वारा धार्मिक नियमों का उल्लंघन करने और अपने घर-बार तथा पतियों को त्यागने में दोष ढूंढ रहे हैं। और जैसे ही आप हमें धार्मिक नियमों का उपदेश देते हैं, हम असहाय हो जाते हैं।
 
"The sound of your flute, combined with your glances that pierce us with the arrows of lust, tempt us to neglect the rituals of religious life. Thus, aroused by lust, we abandon all shame and fear and come to you. But now you are angry with us. You are blaming us for violating religious principles and for abandoning our homes and husbands. When you preach religious principles to us, we are left helpless.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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