श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  3.17.33 
हैल गोपी - भावावेश, कैल रासे परवेश
कृष्णेर शुनि’ उपेक्षा - वचन ।
कृष्णेर मुख - हास्य - वाणी, त्यागे ताहा सत्य मा नि’
रोषे कृष्णे देन ओलाहन ॥33॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "गोपियाँ आनंद में डूबी हुई रास-नृत्य के क्षेत्र में प्रवेश कर गईं, किन्तु कृष्ण के उपेक्षा और विरक्ति भरे वचन सुनकर वे समझ गईं कि वे उनका त्याग करने वाले हैं। अतः वे क्रोध में आकर उन्हें डाँटने लगीं।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “The gopis entered the stage of the rasa dance in a state of ecstasy, but upon hearing Krishna's words of disdain and indifference, they understood that Krishna was about to abandon them. So they began to rebuke him in anger.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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