श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  3.17.3 
एइ - मत महाप्रभु रात्रि - दिवसे ।
उन्मादेर चेष्टा, प्रलाप करे प्रेमावेशे ॥3॥
 
 
अनुवाद
परमानंद में लीन श्री चैतन्य महाप्रभु दिन-रात पागलों की तरह व्यवहार और बातें करते रहते थे।
 
Immersed in devotion, Sri Chaitanya Mahaprabhu worked and spoke like a madman day and night.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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