श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.17.29 
भावावेशे स्वरूपे कहेन गद्गद - वाणी ।
‘कर्ण तृष्णाय मरे, पड़ रसायन, शुनि’ ॥29॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यंत आनंद में डूबकर स्वरूप दामोदर से लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, "मेरे कान प्यास से तड़प रहे हैं। कृपया इस प्यास को बुझाने के लिए कुछ सुनाइए। मुझे इसे सुनने दीजिए।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu, in a very emotional state, said to Swarupa Damodara in a choked voice, "My ears are dying from craving. Please recite something to quench this craving and let me listen."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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