श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  3.17.26 
गोपी - गण - सह विहार, हास, परिहास ।
कण्ठ - ध्वनि - उक्ति शुनि’ मोर कर्णोल्लास ॥26॥
 
 
अनुवाद
"मैंने कृष्ण और गोपियों को हँसी-मज़ाक करते हुए नाना प्रकार की लीलाएँ करते देखा। उनके भाव सुनकर मेरे कानों का आनंद बढ़ गया।
 
I saw Krishna and the gopis joking and enjoying all kinds of pastimes. Their voices filled my ears with joy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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