श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.17.16 
पेटेर भितर हस्त - पद - कूर्मेर आकार ।
मुखे फेन, पुलकाङ्ग, नेत्रे अश्रु - धार ॥16॥
 
 
अनुवाद
उसके हाथ-पैर बिल्कुल कछुए की तरह धड़ में धँस गए थे। उसके मुँह से झाग निकल रहा था, शरीर पर दाने निकल रहे थे और आँखों से आँसू बह रहे थे।
 
His hands and feet had entered inside his stomach, as if they were the limbs of a turtle.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)