श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान  »  श्लोक 136
 
 
श्लोक  3.16.136 
योग्य हञा केह करिते ना पाय पान ।
तथापि से निर्लज, वृथा धरे प्राण ॥136॥
 
 
अनुवाद
“जब कोई व्यक्ति उस अमृत को पीने में समर्थ होता है, तो वह निर्लज्ज व्यक्ति अपना जीवन व्यर्थ ही व्यतीत करता है।
 
When a person capable of drinking this nectar does not drink it, then that shameless person lives in vain.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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