श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 15: श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य उन्माद  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  3.15.96 
प्रलाप सहित एइ उन्माद - वर्णन ।
श्री - रूप - गोसाञि इहा करियाछेन वर्णन ॥96॥
 
 
अनुवाद
वहाँ उन्होंने दिव्य उन्माद और उन्मादपूर्ण प्रलाप प्रदर्शित किया, जिसका वर्णन श्री रूप गोस्वामी ने अपनी स्तवमाला में इस प्रकार बहुत सुन्दरता से किया है।
 
There he manifested divine madness and delirium, which has been beautifully described by Rupa Goswami in his Stavamala.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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