श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 15: श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य उन्माद  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.15.95 
एइ त’ कहिलुँ प्रभुर उद्यान - विहार ।
वृन्दावन - भ्रमे याहाँ प्रवेश ताँहार ॥95॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की उस उद्यान में की गई लीलाओं का वर्णन किया है, जिसमें वे भूलवश वृन्दावन समझकर प्रवेश कर गए थे।
 
In this way I have described the pastime of Sri Chaitanya Mahaprabhu visiting the Pushpavatika.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd