श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 15: श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य उन्माद  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.15.63 
नवाम्बुद - लसद्द्युतिर्नव - तड़िमनोज्ञाम्बरः सुचित्र - मुरली - स्फुरच्छरदमन्द - चन्द्राननः ।
मयूर - दल - भूषितः सुभग - तार - हार - प्रभः स मे मदन - मोहनः सखि तनोति नेत्र - स्पृहाम् ॥63॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, कृष्ण के शरीर की कांति नवनिर्मित बादल से भी अधिक दीप्तिमान है और उनका पीत वस्त्र नव-आगमनित बिजली से भी अधिक आकर्षक है। उनके मस्तक पर मोर पंख सुशोभित है और उनके गले में चमकीले मोतियों का एक सुंदर हार लटक रहा है। जब वे अपनी मनमोहक बांसुरी को अपने होठों से लगाते हैं, तो उनका मुख शरद ऋतु के पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर प्रतीत होता है। ऐसी सुन्दरता से, कामदेव के मोहक मदनमोहन मेरे नेत्रों में उनके दर्शन की अभिलाषा को बढ़ा रहे हैं।"
 
"O dear friend, the radiance of Krishna's body is more radiant than a newly formed cloud, and his yellow robe is more attractive than the newly appearing lightning. A peacock feather adorns his head, and a dazzling pearl necklace hangs from his neck. As he holds the lovely flute to his lips, his face appears as beautiful as the full autumn moon. Possessed of such beauty, Madanmohan, who captivated Cupid, increases the desire of my eyes to see him."
तात्पर्य
यह श्लोक गोविंदलीलामृत (8.4) में भी पाया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)