श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 15: श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य उन्माद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.15.5 
कभु भावे मग्न, कभु अर्ध - बाह्य - स्फूर्ति ।
कभु बाह्य - स्फूर्ति, - तिन रीते प्रभु - स्थिति ॥5॥
 
 
अनुवाद
भगवान स्वयं को चेतना की तीन अवस्थाओं में बनाए रखते थे: कभी वे पूर्णतः आनंदमय भावना में लीन रहते थे, कभी वे आंशिक बाह्य चेतना में रहते थे, और कभी वे पूर्ण बाह्य चेतना में रहते थे।
 
Mahaprabhu maintained his state in three types of consciousness – sometimes he would be completely absorbed in emotion, sometimes he would be in half external consciousness, and sometimes he would be in complete external consciousness.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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