श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 15: श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य उन्माद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.15.17 
एक अश्व एक - क्षणे, पाँच पाँच दिके टाने
एक मन कोन्दिके याय? ।
एक - काले सबै टाने, गेल घोड़ार पराणे
एइ दुःख सहन ना याय ॥17॥
 
 
अनुवाद
"मेरा मन एक घोड़े के समान है जिस पर पाँचों इंद्रियाँ, जिनमें दृष्टि भी प्रमुख है, सवार हैं। मेरी प्रत्येक इंद्रिय उस घोड़े पर सवार होना चाहती है, और इस प्रकार वे मेरे मन को एक साथ पाँच दिशाओं में खींचती हैं। वह किस दिशा में जाएगा? यदि वे सभी एक साथ खींचे जाएँ, तो घोड़ा अवश्य ही प्राण गँवा देगा। मैं इस अत्याचार को कैसे सहन कर सकता हूँ?"
 
"My mind is like a single horse, mounted by the five senses, such as sight and so on. Each sense wants to mount the horse. Thus, they pull the mind in five directions simultaneously. So, which direction will it go? If they all pull together, the poor horse will surely die. How can I endure this cruelty?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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