श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 15: श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य उन्माद  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.15.14 
सौन्दर्यामृत - सिन्धु - भङ्ग ललना - चित्ताद्रि - सम्प्लावकः कर्णानन्द - सनर्म - रम्य - वचनः कोटीन्दु - शीताङ्गकः ।
सौरभ्यामृत - सम्प्लवावृत - जगत्पीयूष - रम्याधरः श्री - गोपेन्द्र - सुतः स कर्षति बलात्पञ्चेन्द्रियाण्यालि मे ॥14॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "यद्यपि गोपियों के हृदय ऊँचे पर्वतों के समान हैं, फिर भी वे कृष्ण के सौन्दर्यरूपी अमृतसागर की लहरों से आच्छादित हैं। उनकी मधुर वाणी उनके कानों में प्रवेश कर उन्हें दिव्य आनंद प्रदान करती है, उनके शरीर का स्पर्श करोड़ों चन्द्रमाओं से भी अधिक शीतल है, और उनकी शारीरिक सुगन्धि का अमृत समस्त जगत को व्याकुल कर देता है। हे मेरे प्रिय सखा! वे कृष्ण, जो नन्द महाराज के पुत्र हैं और जिनके होंठ अमृत के समान हैं, मेरी पाँचों इन्द्रियों को बलपूर्वक आकर्षित कर रहे हैं।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said: "Although the hearts of the gopis are like high mountains, they are flooded with the waves of the nectar-ocean of Krishna's beauty. His sweet voice, entering their ears, gives them transcendental bliss. The touch of His body is cooler than millions of moons, and the nectar of His bodily fragrance fills the entire universe. O friend, Krishna, the son of Nanda Maharaja and whose lips are like nectar, is forcefully attracting my five senses."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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