|
| |
| |
श्लोक 3.14.97  |
करङ्गेर जले करे सर्वाङ्ग सिञ्चन ।
बहिर्वास लञा करे अङ्ग संवीजन ॥97॥ |
|
| |
| |
| अनुवाद |
| गोविन्द ने करंग पात्र से भगवान के सम्पूर्ण शरीर पर जल छिड़का और फिर अपना वस्त्र लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु को पंखा झलने लगे। |
| |
| Govinda sprinkled water all over Mahaprabhu's body with his karang (kamandalu) and then started fanning Sri Chaitanya Mahaprabhu with his own dhoti. |
| ✨ ai-generated |
| |
|