श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  3.14.91 
प्रथमे चलिला प्रभु, - येन वायु - गति ।
स्तम्भ - भाव पथे हैल, चलिते नाहि शक्ति ॥91॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु वायु की गति से दौड़ रहे थे, किन्तु अचानक वे परमानंद में स्तब्ध हो गये और आगे बढ़ने की उनकी सारी शक्ति समाप्त हो गयी।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu was running at the speed of wind, but suddenly he became paralyzed due to emotional outburst, due to which he lost all his strength to move forward.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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