| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव » श्लोक 87 |
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| | | | श्लोक 3.14.87  | एइ श्लोक प ड़ि’ प्रभु चलेन वायु - वेगे ।
गोविन्द धाइल पाछे, नाहि पाय लागे ॥87॥ | | | | | | | अनुवाद | | यह श्लोक पढ़ते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु हवा के वेग से रेत के टीले की ओर दौड़े। गोविन्द उनके पीछे दौड़े, किन्तु वे उनके निकट न पहुँच सके। | | | | Reciting this verse, Mahaprabhu began running with the speed of the wind toward the sand dune. Govinda ran after him, but could not reach him. | | ✨ ai-generated | | |
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