श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  3.14.85 
गोवर्धन - शैल - ज्ञाने आविष्ट ह - इला ।
पर्वत - दिशाते प्रभु धाञा चलिला ॥85॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने रेत के टीले को गोवर्धन पर्वत समझ लिया और उसकी ओर दौड़ पड़े।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu mistook this sand dune for Govardhan mountain and started running towards it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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