श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  3.14.84 
एक - दिन महाप्रभु समुद्रे याइते ।
‘चटक’ - पर्वत देखिलेन आचम्बिते ॥84॥
 
 
अनुवाद
एक दिन, जब श्री चैतन्य महाप्रभु स्नान करने के लिए समुद्र की ओर जा रहे थे, तो अचानक उनकी दृष्टि चतक पर्वत नामक रेत के टीले पर पड़ी।
 
One day when Sri Chaitanya Mahaprabhu was going to take a bath in the sea, he suddenly saw a sand dune named Chatak Parvat.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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