श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  3.14.83 
रघुनाथ - दासेर सदा प्रभु - सङ्गे स्थिति ।
ताँर मुखे शुनि’ लिखि करिया प्रतीति ॥83॥
 
 
अनुवाद
रघुनाथदास गोस्वामी निरंतर श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहे। मैंने उनसे जो कुछ सुना है, उसे मैं बस लिख रहा हूँ। हालाँकि आम लोग इन लीलाओं पर विश्वास नहीं करते, फिर भी मैं उनमें पूर्ण विश्वास रखता हूँ।
 
Raghunatha Dasa Goswami was constantly in the company of Sri Chaitanya Mahaprabhu. I am writing down what I heard from him. Although ordinary people do not believe in these pastimes, I have complete faith in them.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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