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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.14.8 
से - काले ए - दुइ रहेन महाप्रभुर पाशे ।
आर सब कड़चा - कर्ता रहेन दूर - देशे ॥8॥
 
 
अनुवाद
उन दिनों स्वरूप दामोदर और रघुनाथदास गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहते थे, जबकि अन्य सभी टीकाकार उनसे बहुत दूर रहते थे।
 
In those days, only Swarup Damodara Goswami and Raghunatha Dasa Goswami lived with Sri Chaitanya Mahaprabhu, while all other commentators lived far away from him.
तात्पर्य
स्वरूप दामोदर और रघुनाथ दास गोस्वामी के अतिरिक्त भी ऐसी अनेक विभूतियाँ हैं जिन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यों का विवरण किया है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर मानते हैं कि इस प्रकार की टिप्पणियों के उपलब्ध होने पर विश्व के सभी मनुष्य बहुत लाभ उठा सकते हैं। मानव समाज के लिए यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि आजतक ऐसी किसी भी पुस्तिका का चिह्न नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)