| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव » श्लोक 73 |
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| | | | श्लोक 3.14.73  | क्वचिन्मिश्रावा से व्रज - पति - सुतस्योरु - विरहात् श्लथच्छ्री - सन्धित्वाद्दधदधिक - दैर्ध्य भुज - पदोः ।
लुठभूमौ काक्वा विकल - विकलं गद्गद - वचा रुदन्श्री - गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥73॥ | | | | | | | अनुवाद | | "काशी मिश्र के घर में, श्री चैतन्य महाप्रभु कभी-कभी कृष्ण से वियोग में अत्यंत व्यथित हो जाते थे। उनके दिव्य शरीर के जोड़ शिथिल पड़ जाते थे और उनके हाथ-पैर लंबे हो जाते थे। भगवान भूमि पर लोटते हुए, लड़खड़ाती हुई आवाज में वेदना से चिल्लाते और अत्यंत दुःख से रोते थे। मेरे हृदय में श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रकट होना मुझे विक्षिप्त कर देता है।" | | | | “Sometimes, Sri Chaitanya Mahaprabhu would become deeply saddened by the separation from Krishna at Kashi Mishra's house. The joints of his divine body would become loose, and his limbs would become elongated. Rolling on the ground, Mahaprabhu would lament with a choked voice, crying out in agony and extreme grief. This vision of Sri Chaitanya Mahaprabhu arises in my heart and drives me mad.” | | ✨ ai-generated | | |
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