चिंता, चिंता। जैसा कि हंस-दूत (2) में कहा गया है:
यदा यातो गोपी-हृदय-मदनो नंद-सदनान्
मुकुंदो गांडिन्यास तनयं अनुरुंधन मधु-पुरिम्
तदामांक्षीच्चिंतासरिति घना-घूर्णापरिचयैः
अगाधायां बाधामय-पयसि राधा विरहिणी
"अक्रूर के अनुरोध पर, कृष्ण और बलराम नंद महाराज के घर से मथुरा के लिए निकल पड़े। उस समय श्रीमती राधारानी का मन विचलित था, और वह कृष्ण से अत्यधिक वियोग के कारण लगभग पागल हो गई थी। उसने बहुत अधिक मानसिक पीड़ा और उत्तेजना का अनुभव किया, जिसके कारण वह चिंता की नदी में मानसिक अनुमान में डूब गई। उसने सोचा, 'अब मैं मरने जा रही हूं, और जब मैं मर जाऊंगी, तो कृष्ण निश्चित रूप से मुझे फिर से देखने आएंगे। लेकिन जब उन्हें वृंदावन के लोगों से मेरी मृत्यु के बारे में पता चलेगा, तो वह निश्चित रूप से बहुत दुखी होंगे। इसलिए मैं नहीं मरूंगी।' '' यह चिंता शब्द की व्याख्या है।
जागर, जागरण। जैसा कि पद्यावली (326) में कहा गया है:
याः पश्यंति प्रियं स्वप्ने धनास्ताः सखि योषितः
अस्माकं तु गते कृष्णे गता निद्रापि वैरिणी
स्वयं को बहुत दुर्भाग्यशाली समझते हुए, श्रीमती राधारानी ने अपनी बहुत प्रिय सहेली विशाखा को संबोधित किया, "मेरी प्यारी सहेली, अगर मैं अपने सपनों में कृष्ण को देख पाती, तो मैं निश्चित रूप से अपने महान भाग्य के लिए गौरवान्वित होती। लेकिन मैं क्या कर सकती हूं? नींद भी मेरे साथ शरारत करती है। वास्तव में, यह मेरा दुश्मन बन गया है। इसलिए कृष्ण के जाने के बाद से मैं नहीं सोई हूं।"
उद्वेग, मानसिक उत्तेजना। इस शब्द को हंस-दूत (104) में इस प्रकार समझाया गया है:
मनो मे हा कष्टं ज्वलति किमहं हंत करवै
न पारं नावारं सु-मुखि कलयंयस्य जलाधेः
इयं वंदे मूर्ध्ना सपदि तमुपायं कथय मे
परामृशये यस्माद्धृति-कणिकययापि क्षणिकया
श्रीमती राधारानी ने ललिता को संबोधित किया, "मेरी प्यारी सुंदर-चेहरे वाली ललिता, मैं व्यक्त नहीं कर सकती कि मेरा दिल कैसे जल रहा है। यह चिंता का एक महान, अथाह समुद्र है। फिर भी, मैं आपके चरण कमलों पर अपना प्रणाम अर्पित करना चाहती हूं। मैं क्या करूं? कृपया मेरी स्थिति पर विचार करें और मुझे सलाह दें कि मैं कैसे शांत हो सकती हूं। यही मेरी इच्छा है।"
तानव, पतलापन, इस प्रकार वर्णित है:
उदंचद-वक्त्रांभोरूह-विकृतिरंतः-कुलषिता
सदाहारभावा-ग्लपित-कुच-कोका यदु-पते
विशुष्यंती राधा तव विरहा-तापादनु-दिनं
निदाग्हे कुल्य एव क्रशिमा-परिपाकं प्रथयति
जब उद्धव वृंदावन का दौरा करने के बाद मथुरा लौटे, तो भगवान कृष्ण ने उनसे राधारानी और विशाखा के बारे में पूछताछ की। उद्धव ने उत्तर दिया: "गोपियों की स्थिति पर विचार करें! श्रीमती राधारानी विशेष रूप से आपसे अलगाव के कारण बहुत दर्दनाक स्थिति में हैं। वह पतली हो गई है, और उसकी शारीरिक चमक लगभग चली गई है। उसका हृदय पीड़ा में डूबा है, और क्योंकि उसने खाना छोड़ दिया है, उसके स्तन काले हो गए हैं, जैसे कि रोगी हों। आपसे अलगाव के कारण, सभी गोपियाँ, विशेष रूप से राधारानी, सूरज की चिलचिलाती गर्मी के तहत सूखे हुए पानी के छेदों की तरह दिखाई देती हैं।"
मलिन-अंगता, अशुद्धता, का वर्णन इस प्रकार किया गया है:
हिम-विसर-विशीर्णांभोज-तुल्यानान-श्रीः
खर-मारुद-अपराज्यद-बंधु-जीवोपमौष्ठी
अघ-हर शरद-अर्कोत्तापितेंदीवराक्षी
तव विरह-विपत्ति-म्लापितसीद विशाखा
उद्धव ने कृष्ण से कहा, "हे सबसे शुभ कृष्ण, कृपया मुझे सुनें। आपकी अनुपस्थिति के कारण हुई तकलीफ ने विशाखा को सुस्त बना दिया है। तेज हवा में पेड़ों की तरह उसके होंठ कांपते हैं। उसका सुंदर चेहरा एक कमल के फूल जैसा है जो बर्फ के नीचे मुरझा गया है, और उसकी आँखें शरद ऋतु के सूरज की गर्मी से झुलसे कमल के पंखुड़ियों की तरह हैं।"
प्रलाप, पागलपन से बात करना, को ललित-माधव में इस प्रकार समझाया गया है:
ква नंद-कुल-चंद्रमाः क्व शिखि-चंद्र-कालं कृतिः
ква मंद्र-मुरली-रवः क्वनु सुरेंद्र-नील-द्युतिः
ква रास-रस-तांडवी क्व सखि जीव-रक्षौषधिर
निधिर्मम सुहृततमः क्व तव हंता हा धिग्विधिः
यह श्रीमती राधारानी का अपने प्रिय कृष्ण के वियोग में विलाप है, जो घर से दूर थे। जिस स्त्री का पति घर छोड़कर परदेस चला जाता है, वह प्रोषित-भर्तृका कहलाती है। ऐसे ही श्रीमती राधारानी कृष्ण के वियोग में विलाप करते हुए कहती हैं कि, "हे सखी! मेरे प्राणप्रिय, नन्द महाराज के चन्द्रमौलि नन्दन का कुल कीर्ति कहाँ चली गई? इन्द्रनील मणि सदृश्य वर्ण वाले, मोहक बाँसुरी धुन बजाने वाले मेरे कृष्ण कहाँ चले गए? गोपियों! तुम्हारा वह सखा कहाँ है, जो रासमंडल में नृत्य करने में सब में श्रेष्ठ था? मुझे हृदय रोग की मृत्यु से बचाने वाली औषधि मेरे कृष्ण कहाँ हैं? मैं विधाता को धिक्कारती हूँ, जिसने मुझसे मेरे कृष्ण को बिछुड़ाकर मुझे इतने संकट में डाल दिया है।"
रोग का वर्णन ललिता-माधव में इस प्रकार हुआ है-
उत्तापी पुट-पाकतोऽपि गरल-ग्रामादपि क्षोभणो
दम्भोलेरपि दुःसहः कटुरलं हृन्-मग्न शूल्यादपि
तीव्रः प्रौढ-विसूचिका नि चयतोऽप्युच्चैर्ममायम् बली
मर्माण्यद्य भिनत्ति गोकुल-पतेर्विश्लेष-जनमा ज्वरः
श्रीमती राधारानी कृष्ण-वियोग जन्य पीड़ा से अत्यंत दुखी होकर कहती हैं, "हे ललिते! मेरी बात सुनो। कृष्ण-वियोग जन्य बुखार मैं न तो सह पाती हूँ; और न तुमसे कह पाती हूँ। यह ऐसा है जैसे मिट्टी के बर्तन में सुवर्ण को पिघलाया जा रहा हो। यह बुखार विष से भी अधिक कष्ट दे रहा है और वज्रपात से भी अधिक तीखा है। मैं उसी प्रकार पीड़ित हूँ, जैसे लगभग मृतप्राय कोई हैजा रोगी होता है। यह बुखार मुझें इतनी पीड़ा दे रहा है, अतः निश्चय ही यह बहुत बलवान होगा।"
उन्माद का वर्णन इस प्रकार है-
भ्रमति भवन-गर्भे निनिमित्तं हसन्ती
प्रथयति तवा वार्तां चेतनाचेतनेषु
लुठति च भुवि राधा कंपिताङ्गी मुरारे
विषम-विरह-खेदोद्गारी-विभ्रान्ता-चित्ता
उद्धव ने कृष्ण से कहा, "हे कृष्ण! सभी गोपियाँ तुम्हारे विरह में इतनी व्याकुल हैं कि मानो पागल ही हो गई हों। हे मुरारे! श्रीमती राधारानी घर में बिना कारण ही हँसती रहती हैं और पागलों के समान बिना भेद-भाव के प्रत्येक से तुम का हाल पूछती हैं। यहाँ तक कि वे पत्थरों से भी तुमका समाचार पूछती हैं। तुम्हारे वियोग की असहनीय पीड़ा से व्याकुल होकर वे धरती पर लोटती रहती हैं।"
मोह का वर्णन इस प्रकार है-
निरुन्धे दैन्याब्धिम हरति गुरु-चिन्ता परिवधवं
विलुप्त्युन्मादं स्रगयति बलाद् बाष्प-लहरिम्
इदानीं कंसारे कुवलय-दृशः केवलमिदम्
विधत्ते सद्धिष्यं तव विरह-मूर्च्छा-सहचरी
ललिता ने श्रीमती राधारानी की ओर से कृष्ण को निम्नलिखित पत्र लिखा, "हे कृष्ण! श्रीमती राधारानी तुम्हारे वियोग से व्याकुल होकर मूर्च्छित धरती पर गिर गई हैं। हे कंस के शत्रु! तुम अब प्रथम श्रेणी के नेता बन गए हो, इसलिए तुम सभी को संकट से मुक्त कर सकते हो। इसलिए श्रीमती राधारानी की दयनीय स्थिति पर भी ध्यान दो, नहीं तो तुम शीघ्र ही उनकी मृत्यु का समाचार सुनोगे। संभव है कि उस समय तुम्हें पश्चताप होगा, हालाँकि अभी तो तुम बहुत गर्व कर रहे हो।"
मृत्यु का वर्णन हंस-दूत (96) में इस प्रकार है-
अये रास-क्रीड़ा-रसिक मम सख्यं नवनवा
पुरा बद्धा येन प्रणय-लहरी हन्ता गहन
स चेद मुक्तापेक्षस त्वमसि धिगिमां तूल-शकलं
यदेतस्या नासा-निहितमिदमद्यापि चलति
ललिता ने निम्नलिखित पत्र में कृष्ण को मथुरा में रहने के लिए ताड़ना की है, "केवल रासमंडल में नृत्य करके ही तुमने श्रीमती राधारानी के प्रेम को मोह लिया था। अब तुम मेरी प्रिय सखी राधारानी के प्रति इतने उदासीन क्यों हो गई हैं? वह लगभग मूर्च्छित है और तुम्हारी लीलाओं के विषय में सोच रही हैं। मैं उसके नासापुट में रुई का फाहा रखकर देखूँगी कि वह जीवित है अथवा नहीं। यदि वह जीवित होगी, तो मैं उसे ताड़ना दूँगी।"
