मन कृष्ण - वियोगी, दुःखे मन हैल योगी
से वियोगे दश दशा हय ।
से दशाय व्याकुल हञा, मन गेल पला ञा
शून्य मोर शरीर आल य” ॥51॥
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अनुवाद
"जब मेरा मन कृष्ण का संग छोड़ गया और उन्हें देख नहीं पाया, तो वह उदास हो गया और योग साधना में लग गया। कृष्ण से वियोग के शून्य में, उसे दस दिव्य परिवर्तन अनुभव हुए। इन परिवर्तनों से व्याकुल होकर, मेरा मन अपने निवास स्थान, अपने शरीर को, खाली छोड़कर भाग गया। इस प्रकार मैं पूर्णतः समाधि में हूँ।"
"When my mind lost the company of Krishna and could not see Him, it became deeply saddened and took to yoga. In the emptiness of Krishna's separation, it experienced ten transcendental disturbances. Driven by these disturbances, my mind has fled its abode, my body. Thus, I am in complete samadhi."
तात्पर्य
इस श्लोक में कापालिक साधुओं के केवल बाहरी क्रियाकलापों का वर्णन किया गया है, उनके वास्तविक जीवन का नहीं। कापालिक साधु तांत्रिक भौतिकवादी होते हैं जो अपने हाथों में खोपड़िया ले कर चलते हैं। वे वैष्णव नहीं हैं तथा उनका आध्यात्मिक जीवन से कोई लेना-देना नहीं हैं; इसलिए वे अछूत हैं। केवल मन तथा उनकी क्रियाओं के बीच एक बाहरी तुलना की गई है, किन्तु उनके व्यवहार का कभी भी अनुकरण नहीं किया जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥