श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.14.44 
कृष्ण - लीला - मण्डल, शुद्ध शङ्ख - कुण्डल
गड़ियाछे शुक कारिकर ।
सेइ कुण्डल काणे परि’, तृष्णा - लाउ - थाली ध रि’
आशा - झुलि कान्धेर उपर ॥44॥
 
 
अनुवाद
"परम पावन शिल्पी शुकदेव गोस्वामी द्वारा निर्मित कृष्ण की रासलीला की अंगूठी शंख से बनी बाली के समान पवित्र है। मेरे मन का योगी उस बाली को अपने कान में पहने हुए है। उसने लौकी से मेरी आकांक्षाओं का कटोरा गढ़ा है और मेरी आशाओं का थैला अपने कंधे पर धारण किया है।
 
"The play of Krishna's Raas Leela, created by the most auspicious craftsman, Shukdeva Goswami, is as pure as an earring made from a conch shell. The yogi of my mind has worn that earring in his ear. He has fashioned a kamandalu of my desires from a gourd and slung the bag of my hopes on his shoulder.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd